78 वर्ष बाद भी विकास से वंचित ग्रामीण — बिजली, सड़क और पुल की सुविधा नहीं

 


सोलर लाइटें रात करीब 10 बजे तक जलती हैं, उसके बाद पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता है।

साथ वहीं दिन को सुबह से शाम 6 बजे तक बंद रहे है 

ग्रामीणों ने कई बार की आंदोलन की राह, पर नहीं मिली सुनवाई — चुनावी वादों पर जताई नाराजगी

चार माह का राशन अग्रिम वितरण कर दिया जाता है, जिससे कुछ राहत जरूर मिलती है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।

सरपंच एवं ग्रामीणों ने कहा कि शासन प्रशासन की हर योजनाओ लाभ मिला रहा है तो सड़क बिजली पुल पुलिया को बनाएं 


रिपोर्टर - कुलदीप साहू नगरी 

नगरी। छत्तीसगढ़ राज्य अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर चुका है। राज्य को “संपन्न और बीजेपी का सरकार बिजली वाला प्रदेश” कहा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे उलट है। धमतरी जिले के आदिवासी विकासखंड नगरी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सीतानदी अभ्यारण्य के जंगलों में बसे गांव — फरसगांव, खलारी, करही, रिसगांव सहित आसपास के अनेक ग्राम आज भी बिजली, सड़क और पुल जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी वे 1947 जैसी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। सौर ऊर्जा के माध्यम से रोशनी पहुंचाने की सरकारी योजना भी यहाँ अधूरी साबित हो रही है। ग्रामीण बताते हैं कि सोलर लाइटें रात करीब 10 बजे तक जलती हैं, उसके बाद पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता है। मौसम खराब होने के सूर्य नहीं निकलने के कारण व बैटरी मेंटेनेंस की कमी के कारण लाइटें कभी कभी अक्सर रात्रि सौर ऊर्जा जल्दी बंद हो जाती हैं साथ वहीं दिन को सुबह से शाम 6 बजे तक बंद रहे है 

ग्रामीणों ने सवाल उठाया जब राज्य को बिजली सफलाई कहा जाता है, तो हमारे गांव अब तक अंधेरे में क्यों हैं? बरसात में कट जाता है संपर्क, कुछ जगहों पर लकड़ी के पुलों से बना है

आवागमन इन गांवों में सड़क और पुल-पुलिया की स्थिति भी बेहद खराब है। बरसात के मौसम में कच्ची सड़कें कीचड़ में तब्दील हो जाती हैं और सोढूर नदी पर मजबूत पुल न होने के कारण गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। 

ग्रामीणों को किसी आपात स्थिति — खासकर प्रसव पीड़ित महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने में भारी दिक्कतें आती हैं।आपातकालीन सेवाएं 108 और 102 भी इन गांवों तक नहीं पहुंच पातीं, जिससे ग्रामीण मोटरसाइकिलों के सहारे मरीजों को अस्पताल ले जाने को मजबूर हैं। कई जगह ग्रामीणों ने लकड़ी के अस्थायी पुल बनाकर आवागमन की व्यवस्था की है।

शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था भी प्रभावित

क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था बदहाल है। कई विद्यालयों तक पहुंचने के लिए शिक्षकों और विद्यार्थियों को नदी-नालों को पार कर जोखिम उठाना पड़ता है। परिवहन सुविधा नहीं होने से बच्चों की नियमित पढ़ाई प्रभावित होती है। बिजली न होने से विद्यार्थी दीये या सौर लाइट की मंद रोशनी में पढ़ाई करते हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की भी स्थिति चिंताजनक है। गांवों में स्वास्थ्य केंद्र दूर-दराज हैं और दवा आपूर्ति नियमित नहीं हो पा रही। कई बार ग्रामीणों को छोटे-मोटे उपचार के लिए भी नगरी या धमतरी जाना पड़ता है।

कई बार ज्ञापन सौंपने के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई ग्रामीणों ने बताया कि वे कई बार आंदोलन, ज्ञापन और धरना प्रदर्शन के माध्यम से प्रशासन से अपनी समस्याओं के समाधान की मांग कर चुके हैं। परंतु, अब तक किसी स्तर पर ठोस पहल नहीं हुई है।

गांव के ग्रामीणों ने बताया, नेताओ चुनाव के वक्त बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही वापस गांव की तरफ मुड़कर भी नहीं देखते।

सरकारी योजनाएं कागजों तक सीमित

प्रधानमंत्री आवास योजना, महतारी वंदन योजना किसान सम्मान निधि, जैसी विभिन्न योजनाओं का लाभ गांव परिवारों तक पहुंचा है, लेकिन मूलभूत आवश्यकताएं — बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य  आज भी अधूरी हैं। बरसात से पहले शासन की ओर से गांवों में चार माह का राशन अग्रिम वितरण कर दिया जाता है, जिससे कुछ राहत जरूर मिलती है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।

जिसमे रिसगांव, करही, फरसगांव और खल्लारी पंचायतों के जनप्रतिनिधियों तथा ग्रामीणों ने अपनी बात रखी। इस दौरान करही पंचायत के सरपंच बीरबल पदमाकर, फरसगांव की सरपंच शैलेंदी बाई, शत्रुधन मरकाम, ग्राम पंचायत खल्लारी के पूर्व सरपंच तुलाराम नेताम,लोकेश कुजाम, भोजराज कुजाम, सेवक राम मरकाम, सादूराम मरकाम, अनकुराम मणजवी, अगरचंद कुजाम, चिंतराम नेताम, 

गोविंद मडावी, राजेश कुजाम रेवा देवदास, दीनदयाल मरकाम, पंचम कश्यप, राजा राम मरकाम, सुरेंद्र कश्यप, योगेश अग्रवानी, बीरसिंह यादव, कैलाश नेताम, महादेव मरकाम, फग्नूराम, सुकचंद मरकाम, धनेश मरकाम, गंगाराम परदे, जयलाल सोरी, गणेश मरकाम, लखन मरकाम, दयाराम पटेल, दुलारू राम मरकाम, रोशन सोरी तथा दुष्यंत कुजाम सहित समस्त ग्रामवासियों ने अपनी समस्याओं को विस्तारपूर्वक अवगत कराया।

ग्रामीणों ने बताया कि लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है, जिसके समाधान के लिए उन्होंने शासन-प्रशासन से शीघ्र कार्रवाई की मांग की है।

ग्रामीणों की उम्मीदें अब भी जिंदा हैं

लंबे समय से संघर्ष के बावजूद ग्रामीणों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। वे चाहते हैं कि शासन-प्रशासन अब धरातल पर ठोस कार्यवाही करे, ताकि इन गांवों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।ग्रामीणों का कहना है विकास के नाम पर वादे बहुत हुए, अब सरकार को जमीनी स्तर पर काम दिखाना होगा।”

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