चल खुसरो राज्य अगले.... : राजेंद्र शर्मा
राजनीति व्यंग्य-समागम
थैंक यू मोदी जी। बड़ा वाला थैंक यू, यह साफ करने के लिए कि बिहार के बाद, अगला नंबर किस का है। कि बिहार के बाद युद्ध का अगला मोर्चा कहां लगेगा। कि बिहार के बाद, आपकी फतेहयाब फौजें किस तरफ कूच करने वाली हैं। थैंक यू अपनी पार्टी की बिहार विजय रैली से ही सब साफ कर देने के लिए। इस मामले में कोई शक-शुब्हा, कोई कन्फ्यूजन नहीं रहने देने के लिए। किसी अनुमान, किसी अटकल के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ने के लिए।
थैंक यू बिना एक दिन भी गंवाए यह साफ कर देने के लिए कि अब चार-पांच महीने आप जी केरल, तमिलनाडु, पुदुच्चेरी, असम के और सबसे बढ़कर बंगाल के पीएम रहेंगे। चार-पांच महीने आप के नंबर दो, अमित शाह सबसे बढ़कर बंगाल के चाणक्य रहेंगे। आपकी सरकार चार-पांच महीने पूर्व और दक्षिण-वास करेगी। बाकी देश अपना देख ले।
भक्त लोग एकदम सही पकड़े हैं। इन विरोधियों की यही प्राब्लम है, मोदी जी कितना भी अच्छा करें, ये उसमें कुछ न कुछ खोट निकाल ही लेंगे। अब बताइए, इन्हें इसमें भी प्राब्लम है कि अब तक सरकार बिहार में थी, अब अगले चार-पांच महीने सरकार बंगाल में रहेगी, बाकी देश अपना देख ले। कह रहे हैं कि ये तो बड़ी गैर-जिम्मेदारी की बात है, जी। मोदी जी बाकी देश को किस के भरोसे छोड़ रहे हैं? ये बात ही क्या हुई? जब इन्हें पूरे देश की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, तो ये बाकी देश को खुद अपना देख लेने के लिए कैसे छोड़ सकते हैं? फिर ये कोई एक दिन, दो दिन की बात तो है नहीं। सच पूछिए तो सिर्फ चार-पांच महीने की भी बात नहीं है। यह तो मोदी जी के राज में कायदा ही बन गया है। इससे पहले कई महीने से मोदी जी बिहार के पीएम थे और बाकी देश खुद अपना देख रहा था। उससे पहले महाराष्ट्र के पीएम रहे और बाकी देश ने खुद अपना देखा। उससे पहले हरियाणा के पीएम, उससे पहले दिल्ली, वगैरह, वगैरह के पीएम और हर बार बाकी देश अपना देख रहा था। जब बाकी देश को अपना ही देखना है, तो ये पीएम क्या सिर्फ चुनाव के लिए हैं? जहां-जहां चुनाव, वहां-वहां के पीएम।
मगर भक्त बखूबी जानते हैं कि यह विरोधियों का बात को तोड़ना-मरोड़ना है। यह पीएम की गैर-जिम्मेदारी का नहीं, एक्स्ट्रा जिम्मेदार होने का सबूत है। एक्स्ट्रा जिम्मेदार कैसे? पीएम तो इस देश ने बहुत देखे हैं। कम से कम आठ-दस तो देखे ही होंगे। पहले पीएम भी देखे हैं और महिला पीएम भी देखे हैं। कुछ ज्यादा ही पढ़े हुए पीएम भी देखे हैं, तो किसानी धज वाले पीएम भी देखे हैं। उत्तर के पीएम भी देखे हैं, तो दक्षिण के पीएम भी देखे हैं। कई-कई चुनाव जीतने वाले पीएम भी देखे हैं, तो एक भी चुनाव में न चल पाने वाले पीएम भी देखे हैं। और इसकी कसमें खाने वाले पीएम तो खैर देखे ही देखे हैं कि भारत, राज्यों का संघ है। लेकिन, ऐसा पीएम यह देश पहली बार देख रहा है, जिसे सिर्फ दिल्ली के तख्त वाला पीएम होना मंजूर नहीं है। वह बदल-बदल कर, अलग-अलग राज्यों का पीएम बनता रहता है। जिस राज्य में चुनाव होता है, वह उसी राज्य का पीएम होता है। और जब चुनाव ज्यादा दूर होता है, वह अपने राज्य का पीएम होता है। इस तरह, वह एक-एक राज्य को अपना पीएम बनाने का मौका देता है। सब का नंबर आ रहा है। इसी को तो कहते हैं -- सब का साथ, सब का विकास।
और रही बात बाकी देश के अपना देख लेने की तो, उसमें भी एक गहरा प्रयोग है। हर बार, किसी एक राज्य को छोड़कर, बाकी सारे देश को अपना खुद देख लेने का मौका दिया जा रहा है। देश को आत्मनिर्भर बनाने का इससे साहसिक प्रयोग, क्या कभी किसी पीएम ने किया था? राज्य-दर-राज्य, देश यह सीखता जा रहा है कि मोदी जी के बिना, उनके नंबर दो के भी बिना, उनके राज की निगाह और निगरानी के भी बिना, वह अपना देख सकता है। और देश को यह सिखा कौन रहा है? वही पीएम जिस पर विरोधी तानाशाही के, सारी ताकत अपने हाथों में समेट लेने के इल्जाम लगाते हैं। पर विरोधियों को शर्म नहीं आती।
खैर! विरोधियों से मोदी जी का थैंक यू करने की उम्मीद तो कोई करता भी नहीं है। पर एक दिन भी गंवाए बिना, अगले मोर्चे की निशानदेही करने के लिए थैंक यू है, तरह-तरह के कार्यकर्ताओं की तरफ से, जो अब सीधे एक मोर्चे से उठकर, दूसरे मोर्चे के लिए निकल जाएंगे, बीच में शंटिंग में पड़े बोर नहीं होना पड़ेगा। इनमें शब्दश: तरह-तरह के कार्यकर्ता होंगे। संघ से लेकर भगवा पार्टी तक के जमीनी कार्यकर्ताओं के अलावा, जो जाकर नये मोर्चे पर जमीन संभालेंगे, तरह-तरह के स्पेशल कार्यकर्ता तक। राज्य-राज्य घूमकर वोट डालने वाले कार्यकर्ता भी। कई-कई बार वोट डालने वाले, कई-कई नामों से वोट डालने, वगैरह, वगैरह। सब अपने तंबू उठाएंगे और नये मोर्चे की ओर निकल जाएंगे। कितना कन्फ्यूजन बचेगा!
और कन्फ्यूजन से याद आया, सरकार उर्फ बाबू लोग का कन्फ्यूजन दूर करने के लिए भी मोदी जी का बहुत-बहुत थैंक यू। पीएम और उनके नंबर टू, अब बंगाल के पीएम और नंबर टू होंगे, तो क्या अकेले होंगे। उनके साथ पूरा का पूरा सरकारी अमला, बंगाल का हो जाएगा। सारे बंगाली कनैक्शन खोज-खोज कर निकाले जाएंगे। सारे बंगाली प्रोजैक्टों का शिलान्यास होगा। सारे बचे हुए बंगाली महापुरुषों के नाम से डाक टिकट जारी होंगे, सिक्के निकलेंगे, उनके साथ पिछली सरकारों के अन्याय का बदला लिया जाएगा। नेहरू के बंगाल के साथ अन्याय का तो खासतौर पर बदला लिया जाएगा और श्यामाप्रसाद मुखर्जी को महात्मा गांधी से ऊंचा आसन दिया जाएगा। और तो और, पीएम का बंगाल से खास कनेक्शन भी निकल आएगा और हो न हो किसी बंगाली महापुरुष जैसे दाढ़ी-बाल भी पीएम धारण कर लेंगे। बस टैगोर नहीं, वह पिछली बार ही फेल हो चुके हैं। इस सबके लिए जितना टैम मिल जाए, उतना ही कम है। सो थैंक यू मोदी जी, कुछ न कुछ टैम एक्स्ट्रा दिलाने के लिए। 14 तारीख को ही अगले कूच का एलान नहीं करते, तो कुछ न कुछ टैम तो बर्बाद हो ही जाता।
और हां, थैंक यू ज्ञानेश कुमार की तरफ से। निशाने की एकदम सटीक जानकारी देने के लिए। कितना सारा काम पड़ा है, वोटर लिस्टों की छंटाई से लेकर, चुनाव मशीनरी की रंगाई तक। और चुनाव कार्यक्रम की फिक्सिंग वगैरह भी।
और बड़ा वाला थैंक यू बड़े वाले सेठ लोगों की तरफ से, बस ऐंवें ही!
*(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
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*2. उठना प्रधानमंत्री से विश्वास : विष्णु नागर*
प्रधानमंत्री के 'असाधारण नेतृत्व' में सुभाष ने सुबह नौ बजकर बत्तीस मिनट पर बिस्तर छोड़ा, जबकि नरसों, परसों और कल रात भी उसने यह दृढ़ संकल्प किया था कि चाहे सूरज पश्चिम से निकलने लगे, मगर वह सात बजे जागकर दुनिया को चकित कर देगा। मगर उसे पता चला कि दुनिया चकित होने के लिए तैयार नहीं है, तो वह सोता रहा।
पिछले तीन दिनों देर से जागने का उसे अफसोस-सा था, मगर तभी उसे याद आया कि प्रधानमंत्री की तो सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्हें किसी बात का अफसोस नहीं होता। प्रधानमंत्री के सबल नेतृत्व के प्रभाव से उसने भी निश्चय किया कि वह भी किसी बात का अफसोस नहीं करेगा । उसके शब्दकोश से 'अफसोस' शब्द पलायन कर गया, जिसका उसे कोई अफसोस नहीं था!
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पूर्ण आस्था रखते हुए उसने बिस्तर से उठने के प्रयास किया, मगर उसे सफलता नहीं मिली। वह काफी देर तक यूं ही पड़ा रहा, लेकिन उसकी नींद उड़ चुकी थी, तो मन मारकर पंद्रह मिनट 26 सेकंड बाद उसे उठना पड़ा। प्रधानमंत्री के संपूर्ण स्वदेशी के आह्ववान का सम्मान करते हुए उसने विको वज्रदंती टूथपेस्ट से ब्रश किया। उसने सोचा कि स्वदेशी प्रेम जिन प्रधानमंत्री जी में कभी सोता, कभी ऊंघता और कभी जागता रहता है, क्या वह भी इसी टूथपेस्ट से ब्रश करते होंगे? फिर उसे अपनी बुद्धि पर हंसी आई कि वे प्रधानमंत्री हैं, साधारण लोगों के इस देसी टूथपेस्ट का इस्तेमाल करना उनकी आन- बान और शान के खिलाफ है। पद की गरिमा के विरुद्ध है, जिसे साधारण ब्रश और साधारण टूथपेस्ट का प्रयोग कर खंडित नहीं होने दिया जा सकता! अवश्य वह किसी विदेशी टूथपेस्ट और टूथब्रश से ही दांत साफ करते होंगे!
प्रधानमंत्री के सशक्त नेतृत्व में उसने चाय बनाई, मगर वह इतनी अधिक सशक्त बन गई कि बेस्वाद हो गई।उसके मन में एक क्षण के लिए यह खयाल आया कि कहीं इसका कारण प्रधानमंत्री के नेतृत्व का कमजोर होना तो नहीं है, जिसकी खबरें इधर तेजी से उड़े लगी हैं! इस आशंका को निर्मूल करने के लिए उसने ग्लूकोज के दो बिस्कुट लिये और चाय पी, तो स्वादहीनता में भी स्वाद आया। उसे यह खयाल आने लगा कि प्रधानमंत्री तो एक भी दिन बेस्वाद चाय नहीं पीते होंगे और किसी दिन ऐसी चाय उनके सामने आती होगी, तो कप समेत वह फेंक देते होंगे, क्योंकि वह मजबूत प्रधानमंत्री हैं और वह जानते हैं कि इस कप और इस चाय पर उनकी जेब का एक पैसा भी नहीं लगा है, जबकि वह ऐसा नहीं कर सकता। चाय की पत्ती भी उसकी, दूध भी उसका, गैस भी उसकी और बनानेवाला भी वह!
फिर उसे यह भी ख्याल आया कि वह पता नहीं किस ब्रांड की चाय पीते होंगे और कौन कौन-से मसाले उसमें डलवाते होंगे? उसने एक क्षण के लिए यह भी सोचा कि चायवाले के रूप में मशहूर प्रधानमंत्री क्या सचमुच अपनी चाय खुद बनाकर पीते होंगे? फिर उसने इतने निम्न कोटि के विचार आने पर अपने कान पकड़े और मन ही मन प्रधानमंत्री से क्षमा मांगी। फिर उसे लगा कि इससे उसके पापों का प्रक्षालन नहीं होगा, इसलिए उसने अयोध्या के राममंदिर में अवस्थित भगवान श्री राम का स्मरण किया और पापं शांतम कहा!
वह बेरोजगार था और अपने पूजनीय माता-पिता से खर्चे-पानी के पैसे मंगवाता रहता था। उन्होंने भी अपने एकमात्र लाड़ले सुपुत्र की इस सेवा में कोई कमी नहीं आने दी थी, चाहे इसके लिए उन्हें उधार लेना पड़ा हो! घर का सामान बेचना पड़ा हो!!
चाय पीकर फिर से उसका मन लेटने का हुआ, क्योंकि आज भी कुछ नया होने की उम्मीद नहीं थी। फिर इस बात का स्मरण करते हुए कि प्रधानमंत्री 18-18 घंटे काम करते हैं, उसने तत्काल पोटी जाने का काम राष्ट्रीय कर्तव्य समझकर किया। सुखद संयोग कि मई, 2014 के बाद आज पहली बार उसका पेट पूरी तरह साफ हुआ था।उसने याद करने की कोशिश की कि कल उसने ऐसा क्या खाया था कि यह चमत्कार संभव हुआ, तो याद आया कि उसने लंच और डिनर दोनों में समोसे और कचौड़ी ठूंस- ठूंस कर खाई थी। पर यह आज उसका पेट पूरी तरह साफ होने का विश्वसनीय कारण नहीं हो सकता, बल्कि इस वजह से तो पेट और ख़राब होना चाहिए था। गहन आत्मपरीक्षण के बाद उसने पाया कि इसका कोई और कारण नहीं हो सकता, सिवाय इसके कि प्रधानमंत्री ने बताया है कि भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है ओर तेजी से दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।
अब चूंकि अत्यंत सफलतापूर्वक जीवन का यह महत्वपूर्ण प्रातः कालीन चरण पूर्णता को प्राप्त हो चुका था, तो उसके पेट में चूहे दौड़ने लगे। थोड़ी देर में उसे लगा कि नहीं, ये चूहे नहीं, बिल्लियां हैं। इससे पहले उसे इस तरह की अनुभूति कभी नहीं हुई थी। इसका कारण उसे यह समझ में आया कि विकास की जो आंधी देश में बह रही है, उसका यह असर है कि पेट में चूहों की जगह बिल्लियों दौड़ने लगी हैं और भविष्य में इनकी जगह कुत्ते भी ले सकते हैं। वह तेजी से कदम बढ़ाते हुए पास के एक रेस्तरां में पहुंचा। पता चला कि रेस्तरां मालिक के पिता श्री का आज सुबह ही इंतकाल हुआ है। उसे क्रोध आया कि आज ही उसका पेट ऐतिहासिक रूप से साफ हुआ है और आज ही यह संकट सामने आ गया। फिर उसने प्रधानमंत्री चालीसा का पाठ किया और अगले रेस्तरां की तरफ बढ़ा। संयोग से वहां नाश्ता बढ़िया था। पता लगा कि उसका मालिक संघ का अनुशासित सिपाही है। सुभाष इससे प्रभावित हुआ और उसने पैसे देने से पहले उस अनुशासित सिपाही से बात करने की कोशिश की, मगर वह दुकानदारी में इतना व्यस्त था कि सुभाष को इसमें असफलता मिली। मौके का लाभ उठाकर वह बिना पैसे दिए नीचे उतर गया, मगर संघ का अनुशासित सिपाही होने के कारण दुकानदार, फोकटिया ग्राहकों के प्रति बहुत निर्मम था। उसने अपने एक कर्मचारी को उसके पीछे भेजा। सुभाष आने में आनाकानी करने लगा, तो वह कालर पकड़कर ले आया। मालिक की दिली इच्छा तो सुभाष को पीटने की थी, मगर व्यस्तता के चलते उसने चार मोटी गालियां दीं। पैसा वसूल किया और कहा कि अब कभी इस दुकान की सीढ़ियों पर पैर भी मत रखना, वरना साले की हड्डियां तोड़ दूंगा!
इसके बाद लोग कहते हैं कि उसका प्रधानमंत्री के नेतृत्व पर से विश्वास उठ गया है।
*(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
