पिता का साया और बेटी की व्यथा


बैठे सोच रही हूँ मन‌ में, लिखे भाग्य में क्या भगवान।
बीच डगर पितु छोड़ चले हैं, कौन करेगा कन्यादान।।
स्वप्न सँजोए कितने हमने, पापा बेटी मिलकर साथ।
भरी लबालब आँखें मेरी, थाम चलूँ अब किसका हाथ।।

ओढ़े चुनरी सुरमा आँजे, बिटिया कर सोलह श्रृंगार।
रूप चाँदनी दुल्हन देखूँ, छलक उठेगा मेरा प्यार।।
शहनाई अरु ढोलक बाजा, किलकारी होगी चहुॅंओर।
पहनूॅं पगड़ी रेशम धोती, सोच पिता थे भावविभोर।।

कहते रह ना पाऊँ तुम बिन, बिटिया तुम ना जाना दूर।
हर इक वचन निभाऊँगा मैं, प्रीत लुटाऊँगा भरपूर।।
कभी फिक्र ना करना गुड़िया, देना मुझको तुम आवाज।
मेरे अंतस की फुलवारी, सदा रहेगी सर का ताज।।

लांघ देहरी मुझसे पहले, छोड़ गए पीछे संसार। 
बिना पिता के बनी अभागी, जैसे नाव बिना पतवार।।
खोलूँ यादों की गठरी गर, हृदय सदा ही जाता काँप।
पीर सहन ना कर पाती मैं, अंतर्मन से करूॅं विलाप।।

//रचनाकार//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
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