ठंडी से परेशान, हमारे दादा जी- कविता
ठंडी से परेशान, हमारे दादा जी।
रखते ढँक कर कान, हमारे दादा जी।।
सुलगा दो न आग, बोले दादी को।
जल्दी जाते जाग, हमारे दादा जी।।
कसरत प्राणायाम, मजे से करते थे।
करे नहीं आराम, हमारे दादा जी।।
कुड़कुड़ काँपे हाथ, देह सर्दी जकड़े।
पकड़े बैठे माथ, हमारे दादा जी।।
कभी जमाते रौब, पूरे घर पर भी।
कभी दिखाते आँख, हमारे दादा जी।।
मूँछों पर दे ताव, अकड़ कर चलते थे।
घूमे पूरा गाँव, हमारे दादा जी।।
छींक–छींक परेशान, बहुत है जाड़ा में।
कैसे बचाऍं प्राण, हमारे दादा जी।।
करते सब को प्यार, जताते कभी नहीं।
हो गए अस्सी पार, हमारे दादा जी।।
//रचनाकार//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
