रायपुर साहित्य उत्सव में शिक्षिका विधि को मिला विशेष स्टॉल,बच्चों के लिए ध्यान विधियों को मिली सराहना


रायपुर :- राज्य की राजधानी रायपुर में 23 जनवरी से 25 जनवरी तक आयोजित प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय साहित्य उत्सव में कबीरधाम जिले की शिक्षिका एवं अनुभवी ध्यान प्रशिक्षक विधि तिवारी को शिक्षा विभाग के माध्यम से व्यक्तिगत स्टॉल लगाने का विशेष अवसर प्रदान किया गया। यह स्टॉल विशेष रूप से बच्चों के लिए विकसित की गई वैज्ञानिक एवं भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित ध्यान विधियों तथा उनकी शोधपरक पुस्तक को समर्पित रहा,जिसे तीनों दिनों तक भारी जनसमर्थन और सराहना प्राप्त हुई।

साहित्य उत्सव के दौरान विधि तिवारी के स्टॉल पर न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि अन्य जिलों से आए साहित्य प्रेमी,शिक्षक, शिक्षाविद,अभिभावक,छात्र-छात्राएं तथा मानसिक स्वास्थ्य और ध्यान में रुचि रखने वाले बड़ी संख्या में पहुँचे। आगंतुकों ने बच्चों के मानसिक,भावनात्मक और बौद्धिक विकास पर केंद्रित उनकी पुस्तक एवं ध्यान पद्धतियों में विशेष रुचि दिखाई। कई अभिभावकों और शिक्षकों ने बताया कि वर्तमान समय में बच्चों में बढ़ते तनाव, एकाग्रता की कमी और मोबाइल निर्भरता जैसी समस्याओं के समाधान के लिए इस प्रकार की ध्यान विधियाँ अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।

तीन दिवसीय आयोजन में विधि तिवारी द्वारा आगंतुकों को बच्चों के लिए विकसित विशेष ध्यान तकनीकों की जानकारी भी दी गई। उन्होंने यह बताया कि किस प्रकार आयु के अनुसार ध्यान विधियों में परिवर्तन आवश्यक होता है और छोटे बच्चों के लिए सरल,खेल आधारित एवं कल्पना शक्ति से जुड़ी ध्यान पद्धतियाँ अधिक प्रभावी रहती हैं। इस विषय पर उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्होंने पिछले तीन वर्षों में सैकड़ों बच्चों,युवाओं एवं वयस्कों के साथ कार्य करते हुए इन ध्यान तकनीकों को व्यवहारिक रूप से परखा है।

कार्यक्रम के दौरान कई शिक्षकों ने यह भी सुझाव दिया कि इन ध्यान विधियों को विद्यालय स्तर पर पाठ्य सहगामी गतिविधियों के रूप में शामिल किया जाना चाहिए,जिससे बच्चों में एकाग्रता, आत्मविश्वास,भावनात्मक संतुलन और सकारात्मक सोच का विकास किया जा सके। कुछ निजी विद्यालयों के प्रतिनिधियों ने विधि तिवारी से भविष्य में कार्यशाला एवं प्रशिक्षण सत्र आयोजित करने को लेकर भी चर्चा की।

विधि तिवारी ने इस अवसर पर रायपुर जिला कलेक्टर,जिला शिक्षा अधिकारी,शिक्षा विभाग तथा पूरे आयोजन का समन्वय कर रही को-ऑर्डिनेटर टीम के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सहयोग एवं साहित्य उत्सव आयोजन समिति के सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण ही उन्हें राज्य स्तर पर अपने कार्य को प्रस्तुत करने का अवसर मिला,जिससे उनके प्रयासों को नई पहचान मिली है।

उन्होंने आगे बताया कि उनकी विकसित की गई ध्यान विधियाँ केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं हैं,बल्कि इन्हें वीडियो एवं रिकॉर्डेड ऑडियो प्रारूप में भी तैयार किया गया है,ताकि ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के लोग समान रूप से इसका लाभ उठा सकें। डिजिटल माध्यम से ये विधियाँ अब अधिक लोगों तक पहुँच रही हैं,जिससे बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों और शिक्षकों को भी मार्गदर्शन मिल रहा है।

विधि तिवारी का मानना है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में ध्यान, प्राणायाम और मन की एकाग्रता से जुड़ी पद्धतियाँ हजारों वर्षों से प्रचलित हैं,लेकिन आधुनिक शिक्षा प्रणाली में इन्हें व्यवस्थित रूप से शामिल नहीं किया गया है। उनका यह प्रयास इन पारंपरिक विधियों को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और बच्चों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का है,ताकि आने वाली पीढ़ी मानसिक रूप से अधिक सशक्त,संतुलित और आत्मनिर्भर बन सके।

उन्होंने यह भी कहा कि बड़े बच्चों और वयस्कों के लिए प्रचलित ध्यान पद्धतियाँ छोटे बच्चों पर समान रूप से प्रभावी नहीं होतीं। इसी कारण उन्होंने विशेष रूप से 4 से 12 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए अलग-अलग स्तर की ध्यान तकनीकों पर शोध किया है। इन विधियों में श्वास-प्रश्वास, कल्पनात्मक ध्यान,कहानी आधारित ध्यान,संगीत के माध्यम से ध्यान तथा सरल योग-आधारित एकाग्रता अभ्यास शामिल हैं,जो बच्चों को सहज रूप से ध्यान की ओर आकर्षित करते हैं।

रायपुर साहित्य उत्सव में मिली इस सफलता के बाद अब विधि तिवारी की ध्यान विधियाँ कवर्धा सहित छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। कई सामाजिक संगठनों,स्कूल प्रबंधन समितियों और अभिभावक समूहों द्वारा उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशिक्षण शिविर एवं कार्यशालाएं आयोजित करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है।

स्थानीय शिक्षाविदों का मानना है कि यदि इस प्रकार की पहल को शासन स्तर पर प्रोत्साहन मिले,तो यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता और नैतिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। रायपुर साहित्य उत्सव में विधि तिवारी की सहभागिता न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है,बल्कि यह छत्तीसगढ़ में बच्चों के मानसिक विकास को लेकर बढ़ती जागरूकता का भी प्रतीक मानी जा रही है।

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