नगरी ब्लॉक के वनांचल में उम्मीद की रोशनी ग्राम पंचायत करही के गांव मासूलखोई की प्रेरक कहानी


नगरी - छत्तीसगढ़ राज्य के धमतरी जिला अंतर्गत नगरी ब्लॉक का वनांचल क्षेत्र, जो उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व से सटा हुआ है, जो आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। घने जंगल, दूर-दराज़ बसे गांव और नक्सल प्रभावित माहौल में इन सबके बीच शिक्षा की राह आसान नहीं रही। कई गांवों में बच्चे बिना पक्के भवन के पढ़ाई करने को मजबूर हैं; कहीं झोपड़ी में कक्षाएं लगती हैं, तो कहीं पेड़ की छांव ही स्कूल बन जाती है। बारिश में पढ़ाई रुक जाती है और गर्मी में बच्चे तपती जमीन पर बैठकर अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैं।
इन्हीं चुनौतियों के बीच नगरी ब्लॉक का नक्सल प्रभावित एक छोटा सा गांव ग्राम मासूलखोई जो आज उम्मीद और आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर उभरा है।
मासूलखोई के ग्रामीणों और वहां पदस्थ शिक्षकों ने यह संकल्प लिया कि उनके बच्चों का भविष्य अधूरा नहीं रहेगा। सरकारी सहायता की प्रतीक्षा करने के बजाय गांव के लोगों ने आपसी सहयोग से चंदा एकत्र किया।
किसी ने मजदूरी दी, किसी ने लकड़ी, किसी ने ईंट-रेत उपलब्ध कराई, तो किसी ने श्रमदान किया। सामूहिक प्रयास से स्कूल की मुख्य गेट का निर्माण किया गया और पूरे स्कूल भवन की रंगाई-पुताई की गई। दीवारों पर महान पुरुषों की प्रेरक तस्वीरें, हिंदी और अंग्रेजी वर्णमाला, सामान्य ज्ञान संबंधी लेखन और शैक्षणिक चित्र बनाए गए। इससे विद्यालय का वातावरण न केवल आकर्षक बना, बल्कि शिक्षण प्रक्रिया भी रोचक और प्रभावी हुई।

जनसहयोग से सुसज्जित एवं सशक्त विद्यालय।
आज इस स्कूल में साफ-सुथरा और आकर्षक भवन,टाइल्स युक्त कक्षाएं,बच्चों के लिए समुचित बैठने की व्यवस्था
पेयजल हेतु मोटर पंप की सुविधा,हरा-भरा गार्डन
फूल, फलदार पौधे एवं आयुर्वेदिक औषधीय वृक्ष और 
जन सहयोग से निर्मित सांस्कृतिक मंच, जहां बच्चे शिक्षा के साथ-साथ अपनी कला और प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें।
यह सांस्कृतिक मंच विद्यालय के बच्चों को नृत्य, गीत, नाटक और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से आत्मविश्वास बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।

ग्रामीणों ने बताया कि गांव में हर उत्सव और विशेष अवसर पर माता-पिता के नाम से एक पेड़ लगाया जाता है। इससे विद्यालय परिसर हरियाली से आच्छादित हो गया है और बच्चों में पर्यावरण संरक्षण की भावना भी विकसित हो रही है।

आत्मनिर्भरता की अनोखी पहल
विद्यालय विकास के लिए ग्रामीणों ने एक एकड़ भूमि आरक्षित की है। इस भूमि पर धान की खेती की जाती है और उससे होने वाली आय को पूरी तरह स्कूल के विकास कार्यों में लगाया जाता है।
यह पहल केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी और दूरदर्शिता का प्रतीक है।

वनांचल में नई सोच की शुरुआत 
नगरी ब्लॉक का यह इलाका लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से दूर  है। नक्सल प्रभावित होने के कारण बुनियादी सुविधाओं का विस्तार धीमा रहा। लेकिन मासूलखोई के ग्रामीणों ने यह साबित कर दिया कि यदि इरादे मजबूत हों, तो हालात बदले जा सकते हैं।
यह विद्यालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति, जागरूकता और एकजुटता का प्रतीक है। जहां कभी बच्चे झोपड़ी में पढ़ने को मजबूर थे, वहीं आज वे गर्व से अपने सजे-संवरे स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं और सांस्कृतिक मंच पर अपनी प्रतिभा से नई पहचान बना रहे हैं।


आज मासूलखोई की ग्रामीणों की यह पहल पूरे नगरी ब्लॉक और आसपास के वनांचल क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
 यह गांव संदेश दे रहा है 
“अगर सरकार तक आवाज देर से पहुंचे, तो भी अपने बच्चों का भविष्य हम खुद संवार सकते हैं।”
जंगलों के बीच बसा यह छोटा सा गांव आज शिक्षा और संस्कृति की एक बड़ी कहानी लिख रहा है। मसूर कोई ने यह साबित कर दिया है कि बदलाव बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है,और जब समाज एकजुट हो जाए, तो हर अंधेरे में उम्मीद की रोशनी जल सकती ।

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