अगहन विशेष: जानिए कौन सा दिन में मां लक्ष्मी का आशीर्वाद हमेशा रहेगा


"अंतर्मन की साधना, लगा भक्ति में ध्यान।
मनोकामना पूर्ण हो, दर्शन दे भगवान।।"

हमारे हिंदू पंचांग के अनुसार अगहन माह का विशेष महत्व है। कार्तिक माह के पश्चात् अगहन माह जिसे मार्गशीर्ष माह भी कहते हैं, जिसके आते ही ठंड द्वार पर दस्तक देने लगती है। शीतल समीर के साथ ओस की बूँदें स्वर्ग से उतरकर मोतियों की भाॅंति प्रकृति का श्रृंगार करने लगती हैं एवं माता लक्ष्मी की आभा के सदृश्य पृथ्वी लोक में अपनी छटा बिखेरने लगती हैं।

 इस बात में कोई संदेह नहीं कि स्वयं माता लक्ष्मी और देवगुरु बृहस्पति दोनों का साथ में धरती पर आगमन होता है। महिलाऍं एवं कुॅंवारी कन्याऍं व्रत रख कर माता लक्ष्मी को प्रसन्न करती हैं।

  हमारे हिंदू धर्म में महिलाऍं व्रत रखने में पीछे नहीं; हर व्रत को भगवान की भक्ति मान कर सच्चे मन से साधना करती हैं। इसी प्रकार अगहन माह में प्रत्येक गुरुवार के दिन यह व्रत रखा जाता है ताकि माॅं लक्ष्मी का आशीर्वाद सदैव बना रहे।

ऐसे ही हिंदू धर्म के देवांगन कुल में अपनी कुल देवी माता परमेश्वरी में दीप चढ़ाने की परंपरा है। मान्यता है कि माता परमेश्वरी, वीर हनुमान जी तथा माता लक्ष्मी को अगहन में दीप चढ़ाने से कष्ट और निर्धनता दूर होती है। कुल देवी साक्षात् अपने भक्तों पर कृपा कर उन्हें सुख–समृद्धि और वैभव प्रदान करती हैं। साथ में अंजनीपुत्र वीर हनुमान जी माता परमेश्वरी की सहायता के लिए सदैव साथ रहते हैं, इससे वीर हनुमान जी का भी आशीर्वाद भक्तों पर बना रहता है।

दीप दान के नियम:– अगहन बृहस्पतिवार के आते ही परिवार–समाज में एक अलग ही रौनक चेहरे में दीप्तिमान होने लगती है। धान की नई बालियाॅं, नई फसलें तथा माता को भोग के रूप में दीपक अर्पित किया जाता है।

   नई ऊर्जा, नई उमंग शरीर में संचारित होने लगती है। हमारे पूर्वजों के समय से ही यह मान्यता चली आ रही है कि ऐसे ही किसी भी दिन दीप नहीं चढ़ाया जाता है; यह दीप 'देवांगन कुल में अगहन माह के कोई भी एक मंगलवार को अर्पित किया जाता है।'

मंगलवार विशेष– माँ परमेश्वरी के रूप का मंगलवार के दिन प्राकट्य माना जाता है इसलिए कोई भी कार्य मंगलवार के दिन किया जाना शुभ माना जाता है। इससे माता परमेश्वरी प्रसन्न रहती हैं और आशीर्वाद देती हैं। इस दिन हम मिट्टी का दीपक नहीं बल्कि चावल आटे से बना दीपक जलाते हैं।

दीपक बनाने की विधि:– सूर्य किरण के धरा आगमन से पहले महिलाऍं उठ कर स्नान करती हैं और नए धान के चावल को स्वच्छ जल से धो लेती हैं तथा इसे बाँस की टोकरी (चुरकी) में रखती हैं। पानी पूरी तरह से निकल जाने के बाद उसे धूप की आँच दिखाती हैं।

 एक–दो घंटे में चावल के सूख जाने पर उसे अच्छी तरह साफ कर पिसती हैं। पहले के जमाने में सिलबट्टे में इसे पीसा जाता था, अब इस आधुनिक युग में मील या मिक्सी का सहारा लिया जाता है। शाम के समय एक बर्तन में चावल आटा रखकर उसमें गर्म पानी डालते हैं, जिसे (खुद करना) बोला जाता है। 

धीरे–धीरे आटा गूंथने के बाद उसे छोटे–छोटे दीयों का आकार दिया जाता है तत्पश्चात गैस चूल्हे में रखे गर्म पानी के उबलने के बाद उसमें छन्नी या जालीदार बर्तन की सहायता से उन कच्चे दीपकों को रखकर ढँक दिया जाता है। लगभग पंद्रह से बीस मिनट तक भाप की सहायता से पकाया जाता है। नए चावल से तैयार दीपक बहुत ही अच्छा और मुलायम बनता है।

पूजन विधि– सूर्यास्त होते ही घरों में घंटी की ध्वनितरंगें चारों दिशाओं में गूंजने लगती हैं। धूप की महक आत्मा को छू जाती है। कपूर से नकारात्मक ऊर्जा घरों में प्रवेश नहीं करती है। 

 माताऍं पूरे घर की साफ–सफाई करने के पश्चात् देवता कमरा (पूजन का एक अलग सा कमरा जो विशेष देवताओं के लिए बनाया जाता है) को पीली मिट्टी (पींवरी छूही) से लिपाई करती हैं, उसके बाद परिवार के सभी सदस्य माता परमेश्वरी के पूजन स्थान में जाकर चावल आटे से बने दीपक में बाती लगाकर उसमें तेल डालकर जलाते हैं, हूम–धूप, अगरबत्ती, चंदन, कपूर और गेंदे के पुष्प के साथ नतमस्तक होकर माता का आशीर्वाद लेते हैं और वैभव की कामना करते हैं। 

घर के बड़े बुजुर्ग से शुरुआत करते हुए सबसे छोटे बच्चे तक क्रमश: इस विधान का अंत किया जाता है। कुल के सभी देवी–देवताओं को बारी–बारी से प्रणाम करते हैं। उसके बाद घर के हर एक कोने में चावल आटे का दीपक रखा जाता है, जिससे माता लक्ष्मी का आगमन होता है।

प्रसाद– पूजन विधि समाप्त होने के बाद बच्चे घर के बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं। वैसे तो प्रसाद ग्रहण करने का सभी इंतजार करते हैं लेकिन बच्चे कुछ ज्यादा ही उत्सुक होते हैं। इस दिन आसपास जितने भी देवांगन परिवार रहते हैं, उन्हें चावल आटा का दीपक प्रसाद के रूप में वितरण करते हैं। एक–दूसरे के घर दीया पहुँचाने की परंपरा है। इस दिन को त्यौहार स्वरूप मनाया जाता है। 
       घर आते ही सभी सदस्य एक साथ इकट्ठा होकर चावल आटा का दीपक और साथ में टमाटर मिर्च की चटनी खा कर आनंद लेते हैं। यह मुलायम और स्वादिष्ट होता है। 

                        "सभी धर्म जाति में अपने–अपने कुल के देवी–देवताओं को प्रसन्न रखने का अलग–अलग नियम होता है, इसी प्रकार हमारे देवांगन कुल में भी अगहन बृहस्पति मा‌स में दीपक चढ़ा कर माता को प्रसन्न किया जाता है।"



//रचनाकार//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
Priyadewangan1997@gmail.com
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