शिक्षा ले संवरही भविष्य -शिक्षा के अलख
बीनय कूड़ा ढेर, वहू ला देवव शिक्षा।
उज्ज्वल होय भविष्य, कभू झन माॅंगय भिक्षा।।
बइठे रहिथे राह, कटोरा धरे निहारै।
कभू भूख कलपाय, नयन हा ऑंसू ढारै।।
हावय उन मजबूर, अशिक्षा मा दुख पाथें ।
हाय गरीबी झेल, रात दिन ठोकर खाथें।।
खुलगे हावय स्कूल, मुफ्त बढ़िया सरकारी।
पुस्तक कॉपी पेन, रोज जाही धर थारी।।
देवव थोरिक ध्यान, मदद बर हाथ लमावव ।
बनौ प्रेरणा दूत, जनम भर पुण्य कमावव।।
कर दौ दाखिल आज, ज्ञान ले नाम कमाहीं।।
मिलही बढ़िया काम, खुशी जिनगी भर पाहीं।।
सुनव प्रियू के बात, सबो शिक्षित जब होहीं।
लाहीं नवा बिहान, सुमत के बीजा बोहीं।।
मानवता के पाठ, समझहीं जब नर नारी।
अइसन दीन गरीब, तभे बनहीं संस्कारी।।
रचनाकार
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
